मैं अपने शब्दों की

मैं अपने शब्दों की बारात लाऊंगा,तुम अपनी ग़ज़ल को घूंघट में रखना|

कुछ तुम को भी है

कुछ तुम को भी है अज़ीज़ अपने सभी उसूल, कुछ हम भी इत्तफाक से ज़िद के मरीज़ है।

तुम बात करते हो

तुम बात करते हो इंसानों की, अरे यहाँ अगरबत्तियों के भी मजहब होते है !!

तबाह करके चैन

तबाह करके चैन उसे भी कहाँ होगा.. बुझाकर हमे वो खुद भी धुआं धुआं होगा..

घर में मिलेंगे

घर में मिलेंगे उतने ही छोटे कदों के लोग, दरवाजे जिस मकान के जितने बुलंद है।

जुबां वाले भी

जुबां वाले भी आखिर गूंगे बने हुए हैं, जिन्दा रहेंगे कब तक, मुर्दा जमीर लेकर।

इश्क़ के सारे फ़साने

इश्क़ के सारे फ़साने अधूरे ही क्यूँ हैं! जो मजबूर हुए वही मशहूर क्यूँ हैं!

प्यार करने के लिए

प्यार करने के लिए, गीत सुनाने के लिए .. इक ख़ज़ाना है मेरे पास लुटाने के लिए ..

आँखों की दहलीज़ पे

आँखों की दहलीज़ पे आके सपना बोला आंसू से… घर तो आखिर घर होता है… तुम रह लो या मैं रह लूँ….

शिकायतों का रिवाज़

तुम शिकायतों का रिवाज़ खत्म कर दो… हम शिकायतों की वज़ह खत्म कर देते हैं..

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