उस फूल को

उस फूल को सनद की ज़रूरत ही क्या वसीम
जिस फूल की गवाही में ख़ुशबु निकल पड़े।

चल ओ रे मांझी

चल ओ रे मांझी तू चल ।
अपनी राहों को बनाके एक कश्ती हर पल
न दे के हवाला की क्या होगा यहाँ कल
कुछ अधूरी ख्वाईशो मे भर और बल
कभी उन्हें अपना बना,उनके रंगों मे ढल
युही हर मोड़ हर शहर हर डगर
मुसलसल कर कुछ तू यु पहल
चल ओ रे मांझी तू चल ।