रब के फ़ैसले पर भला कैसे करुँ शक,
सजा दे रहा है ग़र वो कुछ तो गुनाह रहा होगा !!
Tag: जिंदगी शायरी
लफ़्ज़ों से ग़लतफ़हमियाँ
लफ़्ज़ों से ग़लतफ़हमियाँ बढ़ रहीं है.
चलो ख़ामोशियों में बात करते हैं.
चाहूंगा मैं तुझे
चाहूंगा मैं तुझे साँझ सवेरे !!
क्योंकि दोपहर को मुझे बैंक की लाइन में लगना है।
पाया भी उन को
पाया भी उन को खो भी दिया चुप भी हो रहे,
इक मुख़्तसर सी रात में सदियाँ गुज़र गईं…
हाथ पकड़ कर
हाथ पकड़ कर रोक लेते अगर,तुझपर
ज़रा भी ज़ोर होता मेरा,
ना रोते हम यूँ तेरे लिये, अगर हमारी
ज़िन्दगी में तेरे सिवा कोई ओर होता !
इश्क की हिमाकत
इश्क की हिमाकत जो उनसे कर बैठे यूँ ही हम खुदसे बिछड़ बैठे !!!
कोई उम्मीद बर नहीं
कोई उम्मीद बर नहीं आती
नयी करेंसी नज़र नहीं आती
हम वहाँ हैं जहाँ से कैशियर को भी
लाइन हमारी नज़र नहीं आती
आगे आती थी खाली जेब पर हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती
इश्क़ का रंग
इश्क़ का रंग और भी गुलनार हो जाता है….
जब दो शायरों को एक दुसरे से प्यार हो जाता है |
शिकवा तकदीर का
शिकवा तकदीर का, ना शिकायत अच्छी,
वो जिस हाल में रखे, वही ज़िंदगी अच्छी
कोशिश करता हूँ
कोशिश करता हूँ लिखने की,तुम्हारी मुस्कान लिखी नहीं जाती..।
मैं तो अदना सा शायर हूँ, ये दास्तान लिखी नहीं जाती..।